बातों की बुनाई, जादू सा असर
कहते हैं की बोलना तो हम जल्द सीख ही जाते
हैं । पर कब
कहाँ क्या बोलना हैं ये सीखने मैं पूरी उम्र निकल जाती हैं । बोलने का असली हुनर तो तब हैं जब कोई दिल
से बात करे । बात करना बस लफ़्ज़ों को एक के बाद एक जोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि ये तो एक फ़न है, एक कला है, जिसमें न सिर्फ़ कहा जाता है, बल्कि महसूस भी करवाया जाता है। बातों से ही दोस्त बनते हैं तो बातों से दुश्मन भी बन
जाते हैं इसलिए हमें बोलते वक़्त अपने शब्दों पर ध्यान देते हुए बोलना चाहिए जो किसी
को ठेस न पहुचाएं ।
आपने भी नोटिस किया होगा — कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बस दो मिनट की बात में ही अपना असर छोड़ जाते हैं। उनकी बातों में ऐसा अपनापन होता है कि लगता है जैसे बरसों से जानते हैं। वहीं कुछ लोग घंटे भर बोलते रहते हैं पर एक बात भी दिल को नहीं छूती। क्यों? क्योंकि बातचीत में सिर्फ़ बोलना काफ़ी नहीं होता, उसमें जज़्बात, टाइमिंग, और सामने वाले की फ़ीलिंग्स की कद्र करना भी बेहद ज़रूरी है।
आजकल की दुनिया में बातचीत और भी ज़रूरी हो गई है। ऑफ़िस में, दोस्तों के बीच, रिश्तों में, सोशल मीडिया पर — हर जगह आपकी बातचीत ही तय करती है कि लोग आपको कैसे देखते हैं। आपने देखा होगा, जो लोग थोड़े चतुर, समझदार और मीठे बोल वाले होते हैं, वो हर जगह जल्दी फिट हो जाते हैं। बातचीत उनके लिए सिर्फ़ ज़रूरत नहीं, उनकी पहचान बन जाती है।
अब सवाल ये उठता है कि बातचीत को कला कैसे बनाया जाए? सबसे पहले तो सुनना सीखिए। हाँ, सही सुना आपने। बातचीत की सबसे बड़ी ताक़त है — सुनना। जब आप सामने वाले की बात ध्यान से सुनते हैं, तो उसे लगता है कि आप उसकी इज़्ज़त कर रहे हैं। और जब कोई आपकी बात में दिलचस्पी लेता है, तो वो आपसे खुल कर बात करता है। और वहीं से शुरू होती है सही बातचीत। और बातचीत का पहला उसूल है की अपनी बात से ज्यादा
दूसरो की बात को तवज्जो देना , अगर आप दूसरो को ध्यान से सुनते हैं तो सामने वाला भी
आपको सुनने में दिलचस्पी लेगा ।
दूसरी बात — बोलने का तरीका। लहजा बहुत मायने रखता है। एक ही बात को आप प्यार से कहें तो सामने वाला मुस्कराता है, और वही बात अगर रूखेपन से बोलें तो बात बिगड़ जाती है। बातों में नरमी, थोड़ा ह्यूमर, और थोड़ी समझदारी का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी होता है।
तीसरी चीज़ है — फ़ीलिंग्स। बातचीत में भावना होनी चाहिए। बिना जज़्बात के बात करना मतलब जैसे बिना नमक की सब्ज़ी खाना। चाहे आप ग़ुस्से में हों, परेशान हों या खुश — जब आप अपनी बात को सच्चे जज़्बातों के साथ रखते हैं, तो सामने वाला उसे समझता भी है और महसूस भी करता है।
रिश्तों में बातचीत का रोल तो और भी अहम हो जाता है। कई बार रिश्ते इसलिए टूटते हैं क्योंकि लोग बात नहीं करते, या करते हैं तो सिर्फ़ शिकायतें। जबकि बातचीत का मक़सद सिर्फ़ बोलना नहीं, बल्कि रिश्ते जोड़ना होता है। अगर पार्टनर से खुलकर बातचीत हो, तो आधे झगड़े वैसे ही खत्म हो जाते हैं। एक और चीज़ जो बातचीत को कला बनाती है — वो है टाइमिंग। सही वक़्त पर सही बात बोलना भी एक टैलेंट है। कई बार हम या तो बहुत जल्दी कुछ बोल देते हैं या फिर इतना देर कर देते हैं कि बात का मतलब ही खत्म हो जाता है। सोच-समझकर, सही मौके पर बोली गई बात का असर कई गुना ज़्यादा होता है।
अब बात करें प्रोफेशनल लाइफ़ की। वहाँ तो बातचीत आपकी पर्सनालिटी का आइना होती है। इंटरव्यू में, मीटिंग्स में, या क्लाइंट से डील करते वक़्त — आपकी बातचीत ही आपकी योग्यता को दर्शाती है। शब्दों की समझ, भाषा की पकड़ और सामने वाले को अपनी बात में शामिल करना — ये सब एक आर्ट है जो सबको नहीं आता। याद रखें कोई भी जॉब हमें अपनी स्किल से मिलती हैं पर जॉब जाने का कारण हमारा व्यवहार और हमारी बातचीत ही होती हैं । इसलिए हमें कोई भी बात सोच समझकर करनी चाहिए । अंग्रेजी में एक कहावत हैं “ The tongue is not a sword, but it can cut deeper” यानी हमारी ज़बान कोई तलवार नही है पर फिर भी ये गहरे घाव कर सकती हैं ।
बातचीत को कला बनाने के लिए आपको रीडिंग और ऑब्ज़र्वेशन की आदत डालनी होगी । जितना ज़्यादा आप सुनेंगे, पढ़ेंगे,
लोगों की बातचीत पर ध्यान देंगे — उतना ही बेहतर आप खुद को बना पाएंगे। और सबसे ज़रूरी बात — फेक मत बनिए। बातचीत में सबसे सुंदर चीज़ होती है — आपकी असलियत। जब आप अपने असली अंदाज़ में बात करते हैं, तो लोग खुद-ब-खुद आपसे जुड़ने लगते हैं।
अब सोशल मीडिया की बात करें — वहाँ भी बातचीत का अंदाज़ मायने रखता है। वहां कोई आपको देख तो नहीं रहा, लेकिन आपके शब्द आपकी पूरी छवि बना देते हैं। एक पोस्ट, एक कमेंट या एक मेसेज — सबकुछ आपकी सोच और आपकी बातचीत की समझ दिखाते हैं। तो बात बस इतनी सी है — बातचीत को हल्के में मत लीजिए। ये कोई किताब में पढ़ने वाली चीज़ नहीं, ये तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सबसे अहम कला है। इसमें माहिर होना मतलब हर रिश्ते, हर मौके, हर मुश्किल को थोड़ा आसान बना लेना।
आख़िर में यही कहूँगा —
बातचीत सिर्फ़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं है, ये दिलों को छू लेने वाली एक बेमिसाल कला है। जब लफ़्ज़ जादू करते हैं, तब ही बातचीत अपने असली रंग में होती है।
n डॉ खुर्शीद
आलम
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